Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
मानव देह · पृष्ठ 76
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1इन्द्र भी है मायाधीन गोविंद राधे।
2सौ अश्वमेध यज्ञ इन्द्र बना दे॥ 859॥
3नर तनु आधीन गोविंद राधे।
4नरक स्वर्ग अपवर्ग बता दे॥ 860॥
5नर तनु को तो वेद गोविंद राधे।
6सब ही फलों की निसेनी बता दे॥ 861॥
7भव तो है जलनिधि गोविंद राधे।
8नर तनु जलयान पार पहुँचा दे॥ 862॥
9भव पार जाना हो तो गोविंद राधे।
10जलयान चालक गुरु को बना दे॥ 863॥
11उठ उठ जाग जाग गोविंद राधे।
12गुरु ढिग जा गुरु गैल बता दे॥ 864॥
13अति दुर्लभ तीनों गोविंद राधे।
14नर-तनु श्रद्धा गुरु-शरण बता दे॥ 865॥
15हरि को न भूलो मन गोविंद राधे।
16नर तनु सुर दुर्लभ ना गमा दे॥ 866॥
17हरि की कृपा ते कभु गोविंद राधे।
18नर तनु मिले वाय यूँ ही ना गँवा दे॥ 867॥
19पुण्य पुंज हरि कृपा गोविंद राधे।
20नर तनु पाया काहे जग में गँवा दे॥ 868॥
21अगनित जनम तो गोविंद राधे।
22जग में गमाया यह तनु ना गमा दे॥ 869॥
23जीवन धारण गोविंद राधे।
24वृक्ष भी करते हैं जग में बता दे॥ 870॥