Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जीव का लक्ष्य · पृष्ठ 65
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1तुम योगमाया युक्त गोविंद राधे।
2जीव तो है मायाधीन भेद बता दे॥ 735॥
3तुम भी चेतन हरि गोविंद राधे।
4हम भी हैं चेतन भेद क्या बता दे॥ 736॥
5तुम हो व्यापक जग गोविंद राधे।
6हम भी व्यापक तनु भेद क्या बता दे॥ 737॥
7तुम भी हो अनादि हरि गोविंद राधे।
8हम भी हैं अनादि पुनि भेद क्या बता दे॥ 738॥
9तुम झूठे अज्ञ बने गोविंद राधे।
10मैं भी झूठा विज्ञ बना भेद क्या बता दे॥ 739॥
11तुम विज्ञ कर्म अज्ञ गोविंद राधे।
12मैं अज्ञ कर्म विज्ञ भेद क्या बता दे॥ 740॥
13जेहि उर तुम रहो गोविंद राधे।
14सोइ उर मैं भी रहुँ भेद क्या बता दे॥ 741॥
15तू भी माँगे द्वार द्वार गोविंद राधे।
16छाछ, मैं भी माँगूँ सुख भेद क्या बता दे॥ 742॥
17तू भी प्रेमियों ते माँगे गोविंद राधे।
18प्रेम, मैं भी माँगूँ प्रेम भेद क्या बता दे॥ 743॥
19दिव्य प्रेम का ही तो हूँ गोविंद राधे।
20मैं भूखा तू भूखा भेद क्या बता दे॥ 744॥
21चोरी ते तू पाप हरे गोविंद राधे।
22चोरीे ते मैं पाप करुँ भेद क्या बता दे॥ 745॥
23गोपी प्यार ते तू जार गोविंद राधे।
24जग प्यार ते मैं जार भेद क्या बता दे॥ 746॥