Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जीव का लक्ष्य · पृष्ठ 64
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1ऐसे हरि में न सुख गोविंद राधे।
2हरि ही हैं सुखसिन्धु रूप बता दे॥ 723॥
3हरि में जो सुख हो तो गोविंद राधे।
4हरि कोइ सुखहीन पात्र हो बता दे॥ 724॥
5हरि कहु सुख कहु गोविंद राधे।
6हरि सुख पर्यायवाची बता दे॥ 725॥
7सब जीव सुख चाहें गोविंद राधे।
8याते सब जीव हरि भक्त हैं बता दे॥ 726॥
9सारा जग सुख चाहे गोविंद राधे।
10सुख का ही अंश जीव वेद बता दे॥ 727॥
11सब हरि सुख भक्त गोविंद राधे।
12जग सुख मिथ्या याते हरि सुख ना दे॥ 728॥
13हरि सुख अनन्त दिव्य गोविंद राधे।
14दुःख भी दिव्यानन्द युक्त है बता दे॥ 729॥
15तुम भी चित् हम भी चित् गोविंद राधे।
16तुम हो विज्ञ हम हैं अज्ञ क्यों बता दे॥ 730॥
17तू भी उर मैं भी उर गोविंद राधे।
18तू है द्रष्टा मैं हूँ भोक्ता क्यों बता दे॥ 731॥
19मैं हूँ ब्रह्म मायाधीश गोविंद राधे।
20तू है जीव मायाधीन भेद यों बता दे॥ 732॥
21तुम मायी हम मायी गोविंद राधे।
22मायाधीश मायाधीन भेद क्यों बता दे॥ 733॥
23तुममें हममें माया रहे गोविंद राधे।
24तुममें दासी हम में स्वामिनि क्यों बता दे॥ 734॥