Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जीव का लक्ष्य · पृष्ठ 62
Reading 74 of 516 · Source nos. 699–710 · Source PDF 79
1जो ब्रह्म आनन्द गोविंद राधे।
2वही ब्रह्म सच्चित् भी है बता दे॥ 699॥
3सत चित आनन्द गोविंद राधे।
4भाव, क्रिया बुद्धि निज सुख है बता दे॥ 700॥
5क्रिया बुद्धि निज सुख गोविंद राधे।
6हरि को समर्पण अर्पण बता दे॥ 701॥
7“रसो वै सः” मंत्र गोविंद राधे।
8कहे जीव रस अधिकारी बता दे॥ 702॥
9जीव आनन्द चित् गोविंद राधे।
10जीव आनन्द अधिकारी बता दे॥ 703॥
11रसना रसगुल्ले की गोविंद राधे।
12अधिकारिणी है अवशि बता दे॥ 704॥
13रसना में पित्त रोग गोविंद राधे।
14याते रसगुल्ला लगे कड़ुवा बता दे॥ 705॥
15जीव आनन्द मध्य गोविंद राधे।
16माया विजातीय बाधा बता दे॥ 706॥
17जीव का चित्त यदि गोविंद राधे।
18भक्ति ते विमल हो तो बाधा हटा दे॥ 707॥
19नर स्व स्वरूप भूला गोविंद राधे।
20मायावश सात्विक सुखी हो बता दे॥ 708॥
21लक्ष्य बोलने में दो हैं गोविंद राधे।
22सुखप्राप्ति दुःखनिवृत्ति बता दे॥ 709॥
23सब साधन फल गोविंद राधे।
24दुःख निवृत्ति सुखप्राप्ति बता दे॥ 710॥