Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जीव का लक्ष्य · पृष्ठ 57
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2प्रेय ते हटा दे मन गोविंद राधे।
3श्रेय रूपी हरि में ही मन को लगा दे॥ 645॥
4श्रेय में प्रथम हो गोविंद राधे।
5दुख किन्तु पाछे हो सुख ही बता दे॥ 646॥
6प्रेय में प्रथम तुच्छ गोविंद राधे।
7सुख किन्तु पाछे हो दुख ही बता दे॥ 647॥
8कृष्ण प्रीति हित जो हो गोविंद राधे।
9विषयोपभोग सो तो श्रेय बता दे॥ 648॥
10निज प्रीति हित जो हो गोविंद राधे।
11विषयोपभोग सो तो प्रेय बता दे॥ 649॥
12जो सुख आत्म हित गोविंद राधे।
13सोई सुख है श्रेय बता दे॥ 650॥