Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 49
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1मेरा सब कछु तेरा गोविंद राधे।
2तेरा तो है ही तेरा हम तोहिं का दें॥ 571॥
3विधि हरि हर भी हैं गोविंद राधे।
4दर के भिखारी तेरे हम तोहिं का दें॥ 572॥
5तू ही बिनु हेतु दाता गोविंद राधे।
6जग कछु लै के कछु दे दान ना दे॥ 573॥
7तेरे जैसा दाता कौन गोविंद राधे।
8मेरे जैसा भिक्षु कौन बानक बना दे॥ 574॥
9हरि हैं दूर मोते गोविंद राधे।
10यह भावना मम मन ते हटा दे॥ 575॥
11तेरे मेरे बीच में जो गोविंद राधे।
12दूरी अनादि वाको अन्त करा दे॥ 576॥
13तेरे मेरे बीच में जो गोविंद राधे।
14देरी अनादि वाय दूर भगा दे॥ 577॥
15तेरा मेरा नाता ऐसा गोविंद राधे।
16फूल में हो गन्ध जैसे दूरी हटा दे॥ 578॥
17तुझमें मैं मुझमें तू गोविंद राधे।
18दूरी तो नहीं है कछु देरी भी मिटा दे॥ 579॥
19तेरे मेरे बीच में जो गोविंद राधे।
20अनबन है मेरा बनि के मिटा दे॥ 580॥
21तेरे मेरे बीच में जो गोविंद राधे।
22आँखमिचौनी वाय बंद करा दे॥ 581॥
23तेरे मेरे बीच में जो गोविंद राधे।
24खींचातानी हो उसे दूर भगा दे॥ 582॥