Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 46
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1“मैं” को नहिं जाना याते गोविंद राधे।
2माया ने घुमाया अब ज्ञान करा दे॥ 535॥
3माया को न जीता कोई गोविंद राधे।
4किन्तु जिसे चाहे तू ही उसी को जिता दे॥ 536॥
5जिसका वरण करे गोविंद राधे।
6अमर सुहागिनि वाय बना दे॥ 537॥
7तेरा पर्दा योगमाया गोविंद राधे।
8मेरा पर्दा माया दोनों पर्दा हटा दे॥ 538॥
9जानूँ पहिचानूँ नहिं गोविंद राधे।
10एक दूसरे की पहिचान करा दे॥ 539॥
11अच्छा हूँ बुरा हूँ जो हूँ गोविंद राधे।
12तेरा ही तो सुत पितु लाज बचा दे॥ 540॥
13मैं पतंग डोर तू है गोविंद राधे।
14पास बुला ले चाहे दूर भगा दे॥ 541॥
15तू है सँपेरा मेरा गोविंद राधे।
16मैं तेरी नागिनि तूंबी बजा दे॥ 542॥
17तू भी है चोर मैं भी गोविंद राधे।
18चोरी चोरी पाप करुँ जोरी बना दे॥ 543॥
19तन है त्रिभंगी तेरा गोविंद राधे।
20मन है त्रिभंगी मेरा जोरी बना दे॥ 544॥
21तन तेरा काला काला गोविंद राधे।
22मन मेरा काला काला जोरी बना दे॥ 545॥
23तोको नचावे गोपी गोविंद राधे।
24मोको नचावे माया जोरी बना दे॥ 546॥