Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 45
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1जासों मेरा हित हो सो गोविंद राधे।
2दे दे हरि जासों हो अहित ना दे ना दे॥ 523॥
3दे दे दे दे दे दे मूढ़ गोविंद राधे।
4सब कछु दाता को भिखारी बना दे॥ 524॥
5बना फिरता है दाता गोविंद राधे।
6प्रेम माँगूँ तो प्रेमी ढिग क्यों पठा दे॥ 525॥
7निज चमचों को तो गोविंद राधे।
8देता सब, औरों को अँगुठा दिखा दे॥ 526॥
9कहूँगा मैं खोटी खरी गोविंद राधे।
10याते मोको भी निज चमचा बना दे॥ 527॥
11मौन तो तोड़ो हरि गोविंद राधे।
12उत्तर हाँ में या ना में बता दे॥ 528॥
13जाना जाना जाना अब गोविंद राधे।
14मौन का अर्थ स्वीकार बता दे॥ 529॥
15तेरे सब बच्चे अच्छे गोविंद राधे।
16अच्छों के साथ एक बुरे को चला दे॥ 530॥
17बुरा बच्चा भी है अच्छा गोविंद राधे।
18बुरा बच्चा अच्छों का मान बढ़ा दे॥ 531॥
19फिर भी न माने यदि गोविंद राधे।
20माना बुरा है बच्चा अच्छा बना दे॥ 532॥
21मेरे तो बनाने ते गोविंद राधे।
22बिगरी बने ना तू ही बिगरी बना दे॥ 533॥
23माना मैं हूँ मायाधीन गोविंद राधे।
24माया को हटा दे मायातीत बना दे॥ 534॥