Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 44
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1तू तो आनन्दमय गोविंद राधे।
2पतितों के उर कैसे रहता बता दे॥ 511॥
3होते न पतित जो तो गोविंद राधे।
4कौड़ी के होते तुम महँगे बता दे॥ 512॥
5जग में पतित न हों गोविंद राधे।
6तो तोहिं पूछेगा कौन बता दे॥ 513॥
7पतितों ने ही तेरी गोविंद राधे।
8पूजा करवाई सारे जग में बता दे॥ 514॥
9पतितों का ऋण तो पै गोविंद राधे।
10दै के दिव्य प्रेम हो उऋण बता दे॥ 515॥
11पतितों की मानो जो ना गोविंद राधे।
12जायें हम राधा दरबार बता दे॥ 516॥
13मेरे जैसा पतित ना गोविंद राधे।
14तेरे जैसा पावन ना पावन बना दे॥ 517॥
15तुमको तो पापी प्यारा गोविंद राधे।
16मोहिं पाप प्यारा तोहिं पाप छोड़ि का दे॥ 518॥
17पूतना ने विष दिया गोविंद राधे।
18वापै जैसी कृपा किया वैसी कृपा दे॥ 519॥
19मैं हूँ अति दीन हीन गोविंद राधे।
20दीनबन्धु नाम वाला विरद निभा दे॥ 520॥
21निबल का साथ तू दे गोविंद राधे।
22सबल का साथ जग वाले सदा दें॥ 521॥
23तेरे जैसा कौन हुआ गोविंद राधे।
24स्वामी बने दास दास स्वामी बना दे॥ 522॥