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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 43

Reading 56 of 516 · Source nos. 499–510 · Source PDF 60

1मैं मेरा सब तेरा गोविंद राधे।

2जनम जनम का भिखारी तोहिं का दे॥ 499॥

3रिद्धि सिद्धि दासी तेरी गोविंद राधे।

4जग के भिखारी हम सब तोहिं का दे॥ 500॥

5रत्नाकर घर तव गोविंद राधे।

6गृहिणी पद्मा भिखारी तोहिं का दे॥ 501॥

7बातें ना बना रे जीव गोविंद राधे।

8तेरे पास जो कछु भी है काहे ना दे॥ 502॥

9तुमको है प्यार प्यारा गोविंद राधे।

10हमको संसार प्यारा प्यार दिला दे॥ 503॥

11स्वार्थ ही ते प्यार किया गोविंद राधे।

12स्वार्थ बिना कैसे प्यार होता है बता दे॥ 504॥

13प्रेम प्रेम सब कहें गोविंद राधे।

14प्रेम क्या है जानें नहिं प्रेम जना दे॥ 505॥

15प्रेमरस जानूँ नहिं गोविंद राधे।

16प्रेमरस-सिद्धान्त मोहिं समझा दे॥ 506॥

17ज्ञान की सीमा तो है गोविंद राधे।

18प्रेम याते ज्ञान नहिं प्रेम दिला दे॥ 507॥

19धर्म अर्थ काम मोक्ष गोविंद राधे।

20ना दे मोहिं निष्काम प्रेम सुधा दे॥ 508॥

21मिलती है स्वरूप शक्ति गोविंद राधे।

22एकमात्र भक्ति ते भक्ति दिला दे॥ 509॥

23भक्ति तो है तेरी शक्ति गोविंद राधे।

24भक्ति प्राप्त भक्तों ते भक्ति दिला दे॥ 510॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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