Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 42
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1तू तो है विराट सिन्धु गोविंद राधे।
2मैं हूँ तेरा लघु बिन्दु सिन्धु ते मिला दे॥ 487॥
3तू है पुरु ष भूमा गोविंद राधे।
4मैं हूँ अति अल्प मोहिं भूमा बना दे॥ 488॥
5तेरी सत्ता विभु चित् गोविंद राधे।
6मेरी सत्ता अणु चित् निज दासता दे॥ 489॥
7तू तो बड़ा चुंबक गोविंद राधे।
8मैं हूँ लौह कण मोहिं खींचि के दिखा दे॥ 490॥
9तू तो जनु पारस गोविंद राधे।
10मैं हूँ जनु लोहा मोहिं सोना बना दे॥ 491॥
11तू तो ज्ञानानंदमय गोविंद राधे।
12मुझे भी कृपा ते आपु जैसा बना दे॥ 492॥
13तू तो है प्रकाश पुंज गोविंद राधे।
14उर में निवास भी है तम को भगा दे॥ 493॥
15तू तो कोटि सूर्य सम गोविंद राधे।
16माया तम लघु तेज ते भगा दे॥ 494॥
17तू तो सर्वशक्तिमान गोविंद राधे।
18माया जड़ तो अशक्त यदि शक्ति ना दे॥ 495॥
19सृष्टि आदि कर्म करे गोविंद राधे।
20रहे भी अकर्ता ऐसा मोहिं बना दे॥ 496॥
21कर्म, ज्ञान, भक्ति नहिं गोविंद राधे।
22कैसे रिझाऊँ तोहिं तू ही बता दे॥ 497॥
23मैं तेरा मेरा तेरा गोविंद राधे।
24तू ही बता दे पुनि हौं तोहिं का दे॥ 498॥