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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 41

Reading 54 of 516 · Source nos. 475–486 · Source PDF 58

1ब्रह्मा भी न जाने तोहिं गोविंद राधे।

2मैं कैसे जानूँ पहिचानूँ बता दे॥ 475॥

3चेतनों का चेतन गोविंद राधे।

4चेतन चेत न नींद भगा दे॥ 476॥

5पाँच ज्ञान इन्द्रियों को गोविंद राधे।

6बरबस तू निज सेवा में लगा दे॥ 477॥

7उर में त्रिताप ताप गोविंद राधे।

8मोहिं तपाये हरि तू ही बचा दे॥ 478॥

9तू चह अकिंचन गोविंद राधे।

10सब कछु छीनि अकिंचन बना दे॥ 479॥

11बैठे उर जग वारे गोविंद राधे।

12लै के सुदर्शन सब को भगा दे॥ 480॥

13तू तो उरगृह स्वामी गोविंद राधे।

14जिसे चाहे राखे जिसे चाहे भगा दे॥ 481॥

15मेरे उर तू भी रह गोविंद राधे।

16मैं भी उर में ही रहुँ पर्दा उठा दे॥ 482॥

17परदा हटाऊँ कैसे गोविंद राधे।

18परदा की डोरी तेरे कर तू हटा दे॥ 483॥

19तू तो हेतु मेरा गोविंद राधे।

20हेतु बिनु कार्य का स्वत्व ना बता दे॥ 484॥

21तू है सूर्य मैं हूँ तेरी गोविंद राधे।

22किरण वियुक्त मोहिं युक्त बना दे॥ 485॥

23मैं हूँ तरंग तू है गोविंद राधे।

24जलनिधि मोहिं जलनिधि में मिला दे॥ 486॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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