Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 40
Reading 53 of 516 · Source nos. 463–474 · Source PDF 57
1अति दुःख पाया जग गोविंद राधे।
2जिउँ नहिं मरुँ नहिं करूँ क्या बता दे॥ 463॥
3तुझ ते विमुख होके गोविंद राधे।
4बूड़े उतराये भव सिन्धु अगाधे॥ 464॥
5जग ने नचाया नाचा गोविंद राधे।
6एक बार तू भी निज संग नचा दे॥ 465॥
7तू तो है आत्माराम गोविंद राधे।
8मेरी आत्मा भी तेरी रमण करा दे॥ 466॥
9चौरासी लाख घर गोविंद राधे।
10वास किया अब ब्रज वास करा दे॥ 467॥
11सत्याग्रह करुँगा मैं गोविंद राधे।
12दिव्य दृष्टि द्वारा निज द्वार दिखा दे॥ 468॥
13सारा जग देखा भाला गोविंद राधे।
14तेरा लोक देखा नहिं वाउ दिखा दे॥ 469॥
15लख चौरासी द्वार गोविंद राधे।
16देखा एक और तव द्वार दिखा दे॥ 470॥
17लख चौरासी द्वार गोविंद राधे।
18माया ने घुमाया तू घर पहुँचा दे॥ 471॥
19मैं तो हूँ जन्म सूर गोविंद राधे।
20मेरा कर गहि मेरे घर पहुँचा दे॥ 472॥
21लख चौरासी द्वार गोविंद राधे।
22माँगा प्रेम पाया नहिं अब तो दिला दे॥ 473॥
23प्यार ही है प्यारा तोहिं गोविंद राधे।
24प्यार कैसे करुँ प्यार करना सिखा दे॥ 474॥