Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 39
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1भक्ति हो अनन्य मेरी गोविंद राधे।
2ऐसी मति जहाँ मिले मोहिं मँगवा दे॥ 451॥
3अब ना बनाऊँ कभू गोविंद राधे।
4कोई बहाना तेरी भक्ति में बता दे॥ 452॥
5जिस जिस योनि में मैं गोविंद राधे।
6जन्म लूँ भक्ति रहे तोमें बता दे॥ 453॥
7तू तो मोहिं भूला नहिं गोविंद राधे।
8मैं भी तोहिं भूलूँ नहिं ऐसी बना दे॥ 454॥
9तेरे उपकारों का गोविंद राधे।
10आभार माना नहिं मानना सिखा दे॥ 455॥
11ऐसी कोई वस्तु नहिं गोविंद राधे।
12तेरे ऋण ते जो उऋण करा दे॥ 456॥
13गुरु ते मिलाया तूने गोविंद राधे।
14तेरे ऋण उऋण न ऋणियाँ बना दे॥ 457॥
15जला सदा तीन ताप गोविंद राधे।
16अब उर निज विरहाग जला दे॥ 458॥
17पंचकोश बाँधे मोहिं गोविंद राधे।
18निज विरहाग दै के वाय जला दे॥ 459॥
19माया ने सताया अति गोविंद राधे।
20अपना वियोग दै के तू भी सता दे॥ 460॥
21योग में वियोग भय गोविंद राधे।
22याते वियोग ही दे योग मोहिं ना दे॥ 461॥
23जग के लिए तो रोया गोविंद राधे।
24रोया नहिं तेरे लिये अब तो रुला दे॥ 462॥