Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 37
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1विधि हरि हर को भी गोविंद राधे।
2माया है नचाती तू भी माया को नचा दे॥ 427॥
3तू तोे योगमाया पति गोविंद राधे।
4योगमाया ते मेरी माया हटा दे॥ 428॥
5तेरी माया ने बिगाड़ा गोविंद राधे।
6तेरी योगमाया सब बिगरी बना दे॥ 429॥
7माया ने भुलाया तेरी गोविंद राधे।
8माया को भगा दे योगमाया को बुला दे॥ 430॥
9माया दाल गले नहिं गोविंद राधे।
10माया पै तू ऐसा चक्कर चला दे॥ 431॥
11माया ते तीन काया गोविंद राधे।
12दिव्य काया दै केतीन काया मिटा दे॥ 432॥
13तीन काल की जाने गोविंद राधे।
14भावी ना बता दे मेरी भावी बना दे॥ 433॥
15अविद्या की ग्रन्थि ते गोविंद राधे।
16उरझा है जीव उसे कृपा ते सुरझा दे॥ 434॥
17तोहिं सोचना ही तो है गोविंद राधे।
18तेरा सोचना ही मेरा काम बना दे॥ 435॥
19तू तो बिनु कारण गोविंद राधे।
20कृपा करे अब सब कारण हटा दे॥ 436॥
21कहाँ जाउँ का सों कहूँ गोविंद राधे।
22तुम बिनु कौन सुने ठौर बता दे॥ 437॥
23तेरे सिवा और कौन गोविंद राधे।
24जग में कृपालु वाको पता ही बता दे॥ 438॥