Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 36
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1तू तो सर्वशक्तिमान गोविंद राधे।
2मन ते क्यों हार मानी मन को हरा दे॥ 415॥
3तू तो मन मोहन गोविंद राधे।
4मेरे मन ते क्यों हार मानी बता दे॥ 416॥
5सर्वशक्ति युक्त है तो गोविंद राधे।
6निज शक्ति ते माया शक्ति को भगा दे॥ 417॥
7सर्वसमर्थ है तो गोविंद राधे।
8आँखि दिखा के माया शक्ति को डरा दे॥ 418॥
9सर्वनियन्ता है तो गोविंद राधे।
10मेरा मन नियमन करके दिखा दे॥ 419॥
11माया ने मन मोहा गोविंद राधे।
12तू तो माया का स्वामी, मन को हरा दे॥ 420॥
13माया वश भूला तोहिं गोविंद राधे।
14यामें तोहिं अचरज लगे तो बता दे॥ 421॥
15मैंने जो भुलाया तोहिं गोविंद राधे।
16तेरी माया दासी दोषी माया को भगा दे॥ 422॥
17तेरी माया जड़ शक्ति गोविंद राधे।
18कछु ना कर पाये यदि तू शक्ति ना दे॥ 423॥
19माया ते सब हारे गोविंद राधे।
20याको टुक टेढ़ी भौंह दिखा दे॥ 424॥
21तेरी माया तेरी दासी गोविंद राधे।
22टुक भौंह टेढ़ी करि वाय भगा दे॥ 425॥
23माया तो है तेरी शक्ति गोविंद राधे।
24माया शक्ति विधि हरि हरहूँ हरा दे॥ 426॥