Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 35
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1तेरे पास आठों सिद्धि गोविंद राधे।
2वशिता ते निज वश मन को करा दे॥ 403॥
3बड़े बड़े दैत्य मारे गोविंद राधे।
4मेरे मन ते क्यों हारे कारण बता दे॥ 404॥
5तेरी कृपा शक्ति ऐसी गोविंद राधे।
6मूक को भी वेदों का वक्ता बना दे॥ 405॥
7तू तो सर्व समरथ गोविंद राधे।
8पंगु को भी चाह ले तो गिरि पै चढ़ा दे॥ 406॥
9तू तो सर्व समरथ गोविंद राधे।
10चाहे बना दे चाहे मिटा दे॥ 407॥
11स्याह को सफेद करे गोविंद राधे।
12चाहे तो सफेद को भी स्याह बना दे॥ 408॥
13खोटे को खरा अरु गोविंद राधे।
14खरे को भी जब चाहे खोटा बना दे॥ 409॥
15तेरी गति तू ही जाने गोविंद राधे।
16कब किसको उठा दे किसको गिरा दे॥ 410॥
17तेरे हाथ सब कछु गोविंद राधे।
18तू चाहे करतल बाल उगा दे॥ 411॥
19तेरे हाथ सब कछु गोविंद राधे।
20तू चाहे कछु ना ते जगत बना दे॥ 412॥
21तू तो है नट जैसा गोविंद राधे।
22नट जैसा चाहे मरकट को नचा दे॥ 413॥
23तू ही उर प्रेरक गोविंद राधे।
24जिसे जैसा चाहे वैसी चाभी घुमा दे॥ 414॥