Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 34
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1वेद ने जो ज्ञान दिया गोविंद राधे।
2बुद्धि तो माने किन्तु मन झुठला दे॥ 391॥
3बुद्धि माने तू ही मेरा गोविंद राधे।
4मन नहिं माने कहे अनुभव करा दे॥ 392॥
5मन माया दासी सुत गोविंद राधे।
6मैं तो हूँ तेरा सुत मोहूँ हरा दे॥ 393॥
7तू भी चाहे मेरा हित गोविंद राधे।
8मैं भी चाहूँ निज हित मन साथ ना दे॥ 394॥
9बड़े बड़े सन्त हारे गोविंद राधे।
10मन ते, तू याय हरा के दिखा दे॥ 395॥
11निज मनमोहन गोविंद राधे।
12मम मनमोहन बन के दिखा दे॥ 396॥
13मनमोहन नाम झूठा गोविंद राधे।
14यदि सच्चा मेरा मन मोहि के दिखा दे॥ 397॥
15मन को न कोई जीता गोविंद राधे।
16मनमोहन मन मोहि के हरा दे॥ 398॥
17मन नाहिं माने मेरा गोविंद राधे।
18मन मोहि मनमोहन मनवा दे॥ 399॥
19उमा रमा मन मोहे गोविंद राधे।
20मेरा भी तो मन मोहि के दिखा दे॥ 400॥
21विधि हरि हर मोहे गोविंद राधे।
22हौं तब मानौं मोहिं मोहि दिखा दे॥ 401॥
23तू तो जग मोहन गोविंद राधे।
24क्या मैं तेरे जग में नहीं हूँ बता दे॥ 402॥