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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 33

Reading 46 of 516 · Source nos. 379–390 · Source PDF 50

1तेरे जन सीधे सादे गोविंद राधे।

2मैं हूँ कुटिल अति सीधा बना दे॥ 379॥

3तूने मोहे हरि हर गोविंद राधे।

4सुना है, न माने मन, वाय मना दे॥ 380॥

5तू तो माँगे पूरा पूरा गोविंद राधे।

6मैं तो देना चाहूँ थोड़ा पूरा दिला दे॥ 381॥

7तू तो कह “ही” लगा दे गोविंद राधे।

8बुद्धि कह “ही” ना अभी “भी” ही लगा दे॥ 382॥

9तू ही साँचो नातेदार गोविंद राधे।

10जग के तो नातेदार स्वारथी बता दे॥ 383॥

11पढ़ा सुना समझाया गोविंद राधे।

12मन ने न माना तू ही मन को मना दे॥ 384॥

13जाना भी माना भी गोविंद राधे।

14किन्तु परन्तु मन फिर भी लगा दे॥ 385॥

15मन मनमानी करे गोविंद राधे।

16बुद्धि भी मन की हाँ में हाँ मिला दे॥ 386॥

17मन मनमानी करे गोविंद राधे।

18याको ब्रजरस का चस्का लगा दे॥ 387॥

19ब्रजरस बात सुनुँ गोविंद राधे।

20मन चह विषयन का करूँ बता दे॥ 388॥

21कामना ते हारा मैं तो गोविंद राधे।

22काम को हराया तूने कामना हरा दे॥ 389॥

23मन पाँच विषय माँगे गोविंद राधे।

24अपना विषय दै के अपना बना दे॥ 390॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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