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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 32

Reading 45 of 516 · Source nos. 367–378 · Source PDF 49

1माना मैं कृतघ्नी हूँ गोविंद राधे।

2तू बिनु कारण के ही कृपा दे॥ 367॥

3जनम जनम की है गोविंद राधे।

4आसक्ति जग की तू ही छुड़ा दे॥ 368॥

5जग ते मिटा दे नाता गोविंद राधे।

6बरबस अपने आपु ते जुड़ा दे॥ 369॥

7मन मथ मनमथ गोविंद राधे।

8मेरा भी चपल मन मथि के दिखा दे॥ 370॥

9मैं तो तेरा सदा ते हूँ गोविंद राधे।

10मन को भी निज परिजन बनवा दे॥ 371॥

11मेरा मन दास किंतु गोविंद राधे।

12मेरी नहिं माने निज दास बना दे॥ 372॥

13मन तो था मेरा दास गोविंद राधे।

14माया मोहिं मन का ही दास बना दे॥ 373॥

15मन जो जो चाहे वो वो गोविंद राधे।

16तू दे दे जगत ते पिंड छुड़ा दे॥ 374॥

17मन एक जग लागा गोविंद राधे।

18तुझमें लगाने को दूजा मन ला दे॥ 375॥

19मन मेरा सुने नहिं गोविंद राधे।

20तू तो है चक्रधारी चक्र दिखा दे॥ 376॥

21मन बड़ा निर्लज्ज गोविंद राधे।

22बार बार जूते लात खाये भुला दे॥ 377॥

23कुबरी को सीधा किया गोविंद राधे।

24मेरा मन कुटिल है सीधा करा दे॥ 378॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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