Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 31
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1पिता वाला प्यार दे दे गोविंद राधे।
2भुक्ति मुक्ति बैकुंठ आदि मोहिं ना दे॥ 355॥
3यदि है बनाना कछु गोविंद राधे।
4मोहिं दास सखा पिता प्रेयसी बना दे॥ 356॥
5यदि ना बनावे कछु गोविंद राधे।
6माया ने बनाया जो भी वाको मिटा दे॥ 357॥
7तेरी होके सुख माँगूँ गोविंद राधे।
8द्वार द्वार कहु कहा तोहिं शोभा दे॥ 358॥
9मेरी पुकार में ही गोविंद राधे।
10कोई कमी है तोहिं झूठा दोष का दे॥ 359॥
11तू तो गोद लेना चाहे गोविंद राधे।
12शिशु जैसा रोया नहिं तोहिं दोष का दे॥ 360॥
13तू तो मेरे साथ रहे गोविंद राधे।
14मैंने किया पीठ मोहिं सन्मुख ला दे॥ 361॥
15तू तो सदा साथ रहा गोविंद राधे।
16मैं ही कृतघ्नी भूला तोहिं दोष का दे॥ 362॥
17तू तो शुद्ध पारस गोविंद राधे।
18मैं ही हूँ अशुद्ध लोहा तोहिं दोष का दे॥ 363॥
19तू तो मोहिं परखत गोविंद राधे।
20मैं ही पीठ करि बैठा तोहिं दोष का दे॥ 364॥
21बार बार नर तनु गोविंद राधे।
22पाया गमाया हरि तोहिं दोष का दे॥ 365॥
23तुझ सा कृपालु नहिं गोविंद राधे।
24मुझ सा कृतघ्नी कोई हो तो बता दे॥ 366॥