Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 30
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1तेरा सब दिव्य हरि गोविंद राधे।
2मेरा सब मायिक कहु तोहिं का दे॥ 343॥
3मेरा मन मायिक गोविंद राधे।
4तेरे कौन काम आये तू ही बता दे॥ 344॥
5माना मन मायिक गोविंद राधे।
6दे दे हरि को हरि दिव्य बना दे॥ 345॥
7मन बुद्धि मोते माँगे गोविंद राधे।
8मेरा तो मैं भी नहिं मन बुद्धि का दे॥ 346॥
9मन बुद्धि मायिक गोविंद राधे।
10लै केक्या करेगा पहले दिव्य बना दे॥ 347॥
11निर्मल मन चाहे गोविंद राधे।
12मेरा मन समल विमल मन ला दे॥ 348॥
13मेरे उर में रहे गोविंद राधे।
14वाको जो किराया बने वाय चुका दे॥ 349॥
15पूछो जो किराया मोते गोविंद राधे।
16तेरे सिवा उर जो हो मारि भगा दे॥ 350॥
17लख चौरासी स्वाँग गोविंद राधे।
18धरि धरि नाचे कछु पुरस्कार ना दे॥ 351॥
19या तो दे पुरस्कार गोविंद राधे।
20या तो बहुरू पिये के पद ते हटा दे॥ 352॥
21वेद में कहा है तूने गोविंद राधे।
22सब जीव ही मेरे सुत हैं बता दे॥ 353॥
23सुत माँगे पितु सों जो गोविंद राधे।
24वाको जग में ना कोई भीख बता दे॥ 354॥