Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 26
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1तेरी माया ने बनाया गोविंद राधे।
2मोको कुपूत तू सुपूत बना दे॥ 295॥
3तू तो मेरा सखा भी है गोविंद राधे।
4गले ते लगा के सखा धर्म निभा दे॥ 296॥
5तू तो मेरा सुत भी है गोविंद राधे।
6पुनि क्यों पिता की गोद सूनी करा दे॥ 297॥
7तू तो मेरा प्रियतम गोविंद राधे।
8काहे मोहिं जग हाथ सौंपा बता दे॥ 298॥
9तू ही साँचो प्रियतम गोविंद राधे।
10माटी वारे गुड़रों ते पिंड छुड़ा दे॥ 299॥
11तू तो मेरा प्राण ही है गोविंद राधे।
12प्राणहीन तनु को तो लोग जला दें॥ 300॥
13जीने को जी रहा हूँ गोविंद राधे।
14तेरे बिनु जीना कोई जीना है बता दे॥ 301॥
15तेरे बिनु जीना ऐसा गोविंद राधे।
16जैसे जल बिनु मीन रसिक बता दे॥ 302॥
17तेरे बिना मैं हूँ शव गोविंद राधे।
18शव को तो प्रिय जन घर ते हटा दें॥ 303॥
19या तो तू मन ले जा गोविंद राधे।
20या तो मन में ही आ जा झगड़ा मिटा दे॥ 304॥
21उर रह मैं भी तू भी गोविंद राधे।
22तू तो मोहिं देखे मैं ना देखूँ दिखा दे॥ 305॥
23उर रहें हम तुम गोविंद राधे।
24मेरे तेरे बीच में जो आवे भगा दे॥ 306॥