Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 25
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1युग युग सोया हरि गोविंद राधे।
2मोह निशा में निज गोद सुला दे॥ 283॥
3जग है खिलौना तेरा गोविंद राधे।
4तू ही खेल मोको जनि यामें फँसा दे॥ 284॥
5पाँच खिलौने दै के गोविंद राधे।
6बहलाया अब रस पान करा दे॥ 285॥
7पाँच खिलौने ऐसे गोविंद राधे।
8बड़े बड़े ऋषि मुनि मनहूँ लुभा दे॥ 286॥
9माया ने सुलाया ऐसा गोविंद राधे।
10अगनित युग बीते अब तो जगा दे॥ 287॥
11भूखा लखि सुत माता गोविंद राधे।
12देर तक सोते हुए सुत को जगा दे॥ 288॥
13माना मैं कुपूत तोहिं गोविंद राधे।
14तजि को सुपूत हुआ नाम बता दे॥ 289॥
15मायाधीन भी हो गोविंद राधे।
16पाप भी ना करे एक नाम बता दे॥ 290॥
17माना मैंने माना नहिं गोविंद राधे।
18आभार किन्तु तू पिता है क्षमा दे॥ 291॥
19माना मैं कुपूत तेरा गोविंद राधे।
20पिता तो मेरा समर्थ है बता दे॥ 292॥
21होते हैं कुपूत जग गोविंद राधे।
22हुई क्या कुमाता कहुँ तू ही बता दे॥ 293॥
23मुझसे कुपूत ही तो गोविंद राधे।
24तेरे सुपूतों का मान बढ़ा दे॥ 294॥