Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 24
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1तन गंदा मन गंदा गोविंद राधे।
2गंदा गंदा ले ले मोहिं बंदा बना दे॥ 271॥
3तेरे सब बंदे अच्छे गोविंद राधे।
4मैं हूँ बंदा गंदा मोहिं अच्छा बना दे॥ 272॥
5नन्दनंदा सुखकंदा गोविंद राधे।
6वृन्दावन चंदा मोहिं बंदा बना दे॥ 273॥
7नन्दनंदा सुखकंदा गोविंद राधे।
8काट मोह फंदा प्रेम फंदा लगा दे॥ 274॥
9मेरा तन मन धन गोविंद राधे।
10सेवा में ले ले कछु दे चाहे ना दे॥ 275॥
11तेरी इच्छा मेरी इच्छा गोविंद राधे।
12चाहे कछु दे दे चाहे मोहिं कछु ना दे॥ 276॥
13तू भी प्यार करता है गोविंद राधे।
14क्योंकि मैं भी प्यार करता हूँ बता दे॥ 277॥
15दोउ मम प्राण प्राण गोविंद राधे।
16मेरा प्राण भी तो तेरा पुनि तोहिं का दे॥ 278॥
17जैसा भी हूँ तेरा हूँ गोविंद राधे।
18तेरी लाज जाये मेरा काम बना दे॥ 279॥
19मैं तो तेरा सुत हरि गोविंद राधे।
20एक बार निज सुत गले ते लगा दे॥ 280॥
21गले ना लगाया छोड़ो गोविंद राधे।
22आके सामने तेरा पिता हूँ बता दे॥ 281॥
23अब लौं सोया नहिं गोविंद राधे।
24निज शिशु को निज गोद सुला दे॥ 282॥