Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 23
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1हरि तू भी कैसी माँ है गोविंद राधे।
2शिशु कर जग चट्टू झुनझुना थमा दे॥ 259॥
3ब्रजरस बूँद दे दे गोविंद राधे।
4माँ भी शिशु मुख पय बूँद चुवा दे॥ 260॥
5कैसा तू है पिता गोविंद राधे।
6एक बार भी ना सुत सीने ते लगा दे॥ 261॥
7कैसा तू है प्रियतम गोविंद राधे।
8एक बार भी ना प्यारी शब्द सुना दे॥ 262॥
9कैसा तू सखा है गोविंद राधे।
10एक बार भी ना यार कहि के बुला दे॥ 263॥
11स्वामी, सखा, सुत, पति गोविंद राधे।
12चार चार नाता तो सों एक ही निभा दे॥ 264॥
13नाता ना निभाना जाने गोविंद राधे।
14आजा तोहिं नाता निभाना सिखा दे॥ 265॥
15वेद कहे नित्य सखा गोविंद राधे।
16उसी नित्य नाते को अब तो निभा दे॥ 266॥
17वेद कहे सब कछु गोविंद राधे।
18इस वाणी को सच करके दिखा दे॥ 267॥
19शास्त्र वेद पढ़ा सुना गोविंद राधे।
20किन्तु नाहिं माना तू मोहिं मनवा दे॥ 268॥
21अब तो शरण तेरी गोविंद राधे।
22चाहे कछु दे चाहे मोहिं कछु ना दे॥ 269॥
23ले ले मेरा प्राण प्रिय गोविंद राधे।
24दे दे निज दिव्य प्रेम और कछु ना दे॥ 270॥