Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 22
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1तू ही रहेगा मेरा गोविंद राधे।
2निज उर ते लगा या चक्र चला दे॥ 247॥
3तेरी कठोरता भी गोविंद राधे।
4मेरा निष्काम प्रेम और बढ़ा दे॥ 248॥
5अपनी बना ले मोहिं गोविंद राधे।
6तू तो मेरा था है रहेगा भी बता दे॥ 249॥
7तू तो मेरे उर में है गोविंद राधे।
8मुझको भी यह अनुभूति करा दे॥ 250॥
9उर में तू बैठा बैठा गोविंद राधे।
10मेरे कर्म लिखे यह मोहूँ जना दे॥ 251॥
11गर्त गिरा रोये शिशु गोविंद राधे।
12पिता कैसा देखे ना उठाये बता दे॥ 252॥
13सुत माँगे भीख नित गोविंद राधे।
14पितु देखे दयामय कैसे बता दे॥ 253॥
15तूने उठाया गिरि गोविंद राधे।
16क्या मैं गिरि ते भीे भारी जो ना उठा दे॥ 254॥
17तूने उठाया गज गोविंद राधे।
18क्या मैं गज ते भी भारी जो ना उठा दे॥ 255॥
19मैं तो हूँ अबोध शिशु गोविंद राधे।
20तू ही मेरा सब कछु ज्ञान करा दे॥ 256॥
21नवजात शिशु नहिं गोविंद राधे।
22जाने कौन माता माता ज्ञान करा दे॥ 257॥
23भूख है अनादि मेरी गोविंद राधे।
24अँगुठा ही पिया प्रेम दुग्ध भी पिला दे॥ 258॥