Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 21
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1मन ते बने ना तेरा गोविंद राधे।
2रूपध्यान याते टुक झलक दिखा दे॥ 235॥
3तेरा सारा जग खारा गोविंद राधे।
4झलक दिखा के जग मीठा बना दे॥ 236॥
5प्राणधन प्राणेश्वर गोविंद राधे।
6प्राणपति प्राण प्राण झलक दिखा दे॥ 237॥
7जिसने भी देखा तोहिं गोविंद राधे।
8वैकुण्ठ सुख को भी अँगुठा दिखा दे॥ 238॥
9गरबाहीं दीन्हें दोऊ गोविंद राधे।
10एक बार मोहूँ सोई झाँकी दिखा दे॥ 239॥
11गरबाहीं दीन्हें दोऊ गोविंद राधे।
12कभू तो मिलोगे विश्वास दिला दे॥ 240॥
13मोहिं तो भरोसो भारी गोविंद राधे।
14कबहुँ तो अइहैं दोउ गलबँहियाँ दे॥ 241॥
15दर्शन जनि चाहो गोविंद राधे।
16सुना है कि दर्शन प्यास बढ़ा दे॥ 242॥
17तुम दोनों एक ही हो गोविंद राधे।
18मेरे उर अस विश्वास करा दे॥ 243॥
19तू ही मेरा मैं भी तेरा गोविंद राधे।
20यह ज्ञान मेरी बुद्धि में बिठा दे॥ 244॥
21तेरे बीच मैं रहूँ गोविंद राधे।
22मेरे बीच तू रहे बोध करा दे॥ 245॥
23तू था है रहेगा मेरा गोविंद राधे।
24उर अस आस विश्वास दिला दे॥ 246॥