Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 20
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1सर्वप्रथम प्रार्थना है गोविंद राधे।
2थोड़ा रस दे रस का चस्का लगा दे॥ 223॥
3रोने का रोग दे दे गोविंद राधे।
4दिव्य प्रेम पाने की लालसा बढ़ा दे॥ 224॥
5पिछली भुला दे हरि गोविंद राधे।
6अगली बना दे मोहिं पगली बना दे॥ 225॥
7शिव भी शिवानी बने गोविंद राधे।
8बनूँ मैं दिवानी ऐसा जादू चला दे॥ 226॥
9पल लागे जुग सम गोविंद राधे।
10सारा जग खारा लागे ऐसी बना दे॥ 227॥
11दशहूँ दिशा में मोहिं गोविंद राधे।
12जित देखुँ दीखे तू ही ऐसी बना दे॥ 228॥
13तेरा ध्यान ऐसे करुँ गोविंद राधे।
14गाय घास चरे बछरा न भुला दे॥ 229॥
15तेरा ध्यान ऐसा करुँ गोविंद राधे।
16तेरे सिवा मन सब जग को भुला दे॥ 230॥
17तेरा ध्यान ऐसे करुँ गोविंद राधे।
18जैसे भंृगी कीड़ा निज रूप को भुला दे॥ 231॥
19विषयी की प्रीति जैसी गोविंद राधे।
20विषयों में होती है सुदृढ़ बता दे॥ 232॥
21वैसी ही मेरी प्रीति गोविंद राधे।
22हरि गुरु चरणों में सदा करवा दे॥ 233॥
23मैंने तोहिं देखा नहिं गोविंद राधे।
24ध्यान करुँ कैसे टुक झाँकी दिखा दे॥ 234॥