Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 18
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1तेरे उपकारों ते गोविंद राधे।
2कौन हुआ है हरि उऋण बता दे॥ 199॥
3बड़े बड़े ज्ञानी डूबे गोविंद राधे।
4ब्रजरस महँ मैं भी तेरा हूँ डुबा दे॥ 200॥
5तुम तो हो प्रेमसिन्धु गोविंद राधे।
6बरबस मो को प्रेमसिन्धु में डुबा दे॥ 201॥
7जनम जनम की है गोविंद राधे।
8प्रेम पिपासा प्रेम प्याला पिला दे॥ 202॥
9ह्लादिनी का सार प्रेम गोविंद राधे।
10साधना ते मिले नहिं कृपा ते दिला दे॥ 203॥
11तेरी निज कृपा शक्ति गोविंद राधे।
12द्वारा, गुरु द्वारा प्रेम दान करा दे॥ 204॥
13तेरे गुन गन सुनि गोविंद राधे।
14आई हूँ शरण अब तो ना भगा दे॥ 205॥
15प्रेम दिला दे या तो गोविंद राधे।
16अपना सुदर्शन चक्र चला दे॥ 206॥
17तुझ सा कृपण नहिं गोविंद राधे।
18प्रेम का भण्डार भरा धरा किन्तु ना दे॥ 207॥
19धन दिये धन बाढ़ै गोविंद राधे।
20प्रेम दिये प्रेम बाढ़ै पात्र ध्यान ना दे॥ 208॥
21मोहिं प्रेम दे दे यदि गोविंद राधे।
22मेरे अनुयायी सब तेरे बना दे॥ 209॥
23जो ना करे प्रेम तोसों गोविंद राधे।
24वाको संग ना दे ना दे ना दे ना दे ना दे॥ 210॥