Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 16
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1तेरे रोम रोम ते ही गोविंद राधे।
2ब्रजरस चुये इक बूँद पिला दे॥ 175॥
3फिर नाहिं माँगूँगा गोविंद राधे।
4एक बार ब्रज रस छक के पिला दे॥ 176॥
5तू तो ब्रजरस सिन्धु गोविंद राधे।
6कहा घटि जाये तोरा छक के पिला दे॥ 177॥
7तू तो ऐसा पूर्ण ब्रह्म गोविंद राधे।
8पूर्ण ते निकालो पूर्ण पूर्ण बचा दे॥ 178॥
9तन मन प्राण तेरा गोविंद राधे।
10मैं हूँ भिखारी तू है दाता तोहिं का दे॥ 179॥
11तुझ सा न प्रेम दाता गोविंद राधे।
12मुझ सा भिखारी नहिं भीख दिला दे॥ 180॥
13माँगने का काम मेरा गोविंद राधे।
14देने का काम तेरा दे चाहे ना दे॥ 181॥
15कछु भी न देना हो तो गोविंद राधे।
16आके साफ साफ मेरे सामने बता दे॥ 182॥
17तेरे जैसा दाता कोई गोविंद राधे।
18था, न तो है, न तो होगा बता दे॥ 183॥
19तुम ही हो साँचो दाता गोविंद राधे।
20और सब तो हैं भिखारी भीख का दे॥ 184॥
21तेरा सुत भीख माँगे गोविंद राधे।
22द्वार भिखारियों के तू ध्यान ना दे॥ 185॥
23विधि हरि हर तेरे गोविंद राधे।
24द्वार के भिखारी पुनि सुर नर का दे॥ 186॥