Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 15
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1तूने मारे कंस आदि गोविंद राधे।
2मेरे काम आदि को भी मारि के दिखा दे॥ 163॥
3मन बड़ा अभिमानी गोविंद राधे।
4छवि दिखला के अभिमान मिटा दे॥ 164॥
5तेरी छवि ज्ञानियों के गोविंद राधे।
6मरे हुए मन को भी फिर ते जिला दे॥ 165॥
7काम को हराया तूने गोविंद राधे।
8मन दे चुनौती आजा मोहिं हरा दे॥ 166॥
9तेरा तनु है त्रिभंगी गोविंद राधे।
10मेरा मन भी त्रिभंगी तन ते मिला दे॥ 167॥
11तुझसा दयालु कौन गोविंद राधे।
12पूतना सी पापिनी को मुक्ति दिला दे॥ 168॥
13तुझसा उदार कौन गोविंद राधे।
14जो कुब्जा को भी कमला बना दे॥ 169॥
15झोली न लाया मैं तो गोविंद राधे।
16झोली भी दे झोली भर के दिखा दे॥ 170॥
17तू तो आनन्द सिन्धु गोविंद राधे।
18मैं हूँ अंश आनन्द बिन्दु ही पिला दे॥ 171॥
19आनन्दहुँ आनन्द गोविंद राधे।
20प्रेमानन्द की एक बूँद पिला दे॥ 172॥
21प्यासे रहे प्रेम के गोविंद राधे।
22प्रेम सुधा दे मेरी प्यास बुझा दे॥ 173॥
23तू तो है प्रेम सिन्धु गोविंद राधे।
24इक बूँद इस प्यासे को भी पिला दे॥ 174॥