Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 14
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1मैं खोटे ते खोटा गोविंद राधे।
2मारि दृग चोट लोट पोट करा दे॥ 151॥
3मैं हूँ विचित्र पापी गोविंद राधे।
4पापी न मानूँ कहूँ पावन बना दे॥ 152॥
5दीनबंधु तेरा नाम गोविंद राधे।
6मेरो बनि जाओ ऐसी उर दीनता दे॥ 153॥
7ब्रह्म तो बनावे बड़ा गोविंद राधे।
8मोको तो छोटे ते छोटा बना दे॥ 154॥
9ब्रह्म तो बनावे ब्रह्म गोविंद राधे।
10मोको तो ब्रह्म का दास बना दे॥ 155॥
11तुझसा न दीनानाथ गोविंद राधे।
12मुझसा न दीन अनाथ कृपा दे॥ 156॥
13नाम भक्तवत्सल सुनि गोविंद राधे।
14डरूँ, दीनबन्धु नाम साहस बढ़ा दे॥ 157॥
15मेरे काजे काहे हरि गोविंद राधे।
16आपुन दीनबन्धु विरद नसा दे॥ 158॥
17बुद्धि ते न जाना जाये गोविंद राधे।
18तो को जाने तू ही या तू जिसको जना दे॥ 159॥
19प्राकृत बुद्धि ते तो गोविंद राधे।
20आत्मा का ज्ञान ही असम्भव बता दे॥ 160॥
21मेरी बुद्धि मायिक गोविंद राधे।
22तू है दिव्य दिव्य ज्ञान कृपा ते करा दे॥ 161॥
23तेरे हाथ में है सब गोविंद राधे।
24माया को जिता दे चाहे जीव को जिता दे॥ 162॥