Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 11
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1माना तुम भगवान गोविंद राधे।
2हो, किन्तु मेरा प्रेम भग को भगा दे॥ 115॥
3एक वर माँगूँ पिय गोविंद राधे।
4दोउ कर की गरमाला पिन्हा दे॥ 116॥
5मेरे पास आया नहिं गोविंद राधे।
6मोको भी बुलाया नहिं कैसा पी बता दे॥ 117॥
7आये न बुलाये न गोविंद राधे।
8मेरा पिय तू ही था है रहेगा बता दे॥ 118॥
9तेरा मेरा प्यार सच्चा गोविंद राधे।
10एक बार प्यारी कहि मोहिं बुला दे॥ 119॥
11तेरे तो अनेक जन गोविंद राधे।
12मेरा एक तू ही जनि मोहिं भुला दे॥ 120॥
13तेरा मेरा अंग संग गोविंद राधे।
14होगा या ना होगा मेरे कान में बता दे॥ 121॥
15तू तो मेरी आत्मा है गोविंद राधे।
16मेरी आत्मा ते मेरा रमण करा दे॥ 122॥
17तेरे बिनु जीना नहिं गोविंद राधे।
18जीना जी ना लगे अब जग ते उठा दे॥ 123॥
19वृंदारकवृंदवंद्य गोविंद राधे।
20तुम बिन रहा नहिं जाये पल आधे॥ 124॥
21विरह ना सहा जाये गोविंद राधे।
22रहा नाहिं जाये करुँ क्या तू बता दे॥ 125॥
23जब ते सुना है कान गोविंद राधे।
24हरि-गुन आँखि कहे मोहूँ दिखा दे॥ 126॥