Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 9
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1और कछु माँगूं नहिं गोविंद राधे।
2तू ही मेरा बन मोहिं अपनी बना दे॥ 91॥
3अपनी बना ना बना गोविंद राधे।
4मेरा बन गया या ना ये तो बता दे॥ 92॥
5मेरा भी बना ना हो जो गोविंद राधे।
6मेरा बनने का साधन बता दे॥ 93॥
7मैंने तो बनाया पिया गोविंद राधे।
8स्वीकार हो तो प्यारी कहि के बुला दे॥ 94॥
9प्यारी कहने में यदि गोविंद राधे।
10लाज लागे तो आके सिर ही हिला दे॥ 95॥
11स्वामी, सखा, सुत, पति गोविंद राधे।
12रसिक बतावें तोसों चार चार नाते॥ 96॥
13कल्पित नाते भी गोविंद राधे।
14जग में निभाते सत्य नाते निभा दे॥ 97॥
15जग सों न तोड़ा नाता गोविंद राधे।
16तोसों न जोड़ा नाता तोहिं दोष का दे॥ 98॥
17माना न जोड़ा नाता गोविंद राधे।
18फिर भी है नाता नाता नाता निभा दे॥ 99॥
19कैसे रिझाऊँ तोहिं गोविंद राधे।
20प्रेम ते हूँ निर्धन धनी तो बना दे॥ 100॥
21रोम रोम चाहे तोहिं गोविंद राधे।
22ऐसी प्रेम रस मदिरा को पिला दे॥ 101॥
23जलहीन मीन जैसे गोविंद राधे।
24तलफूँ मैं तेरे बिन ऐसी बना दे॥ 102॥