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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 6

Reading 19 of 516 · Source nos. 55–66 · Source PDF 23

1परदोष देखूँ नहिं गोविंद राधे।

2परनिन्दा करुँ नहिं ऐसा बना दे॥ 55॥

3हीरा ना दे मोती ना दे गोविंद राधे।

4या तो कछु ना दे या तो प्रेम सुधा दे॥ 56॥

5हरि हर पद ना दे गोविंद राधे।

6अमृत सर ना दे प्रेम सुधा दे॥ 57॥

7भुक्ति ना दे मुक्ति ना दे गोविंद राधे।

8देना है तो सीधे सीधे प्रेम भिक्षा दे॥ 58॥

9स्वर्ग अपवर्ग ना दे गोविंद राधे।

10गोपी प्रेम वाला एक प्याला पिला दे॥ 59॥

11यदि कहो वर माँगो गोविंद राधे।

12वर माँगूँ माँगने की कामना मिटा दे॥ 60॥

13एक वर माँगूँ हरि गोविंद राधे।

14माँगने की बुद्धि कभु सपनेहुँ ना दे॥ 61॥

15तेरी इच्छा दिव्य दिव्य गोविंद राधे।

16मेरी इच्छा मायिक पतन करा दे॥ 62॥

17तो सों नहिं माँगूँ कछु गोविंद राधे।

18गोपी जन ते गोपी प्रेम दिला दे॥ 63॥

19वेद कहे तू ही मेरा गोविंद राधे।

20प्राण लै के प्राणधन प्रेम दिला दे॥ 64॥

21तू तो है कृपालु पुनि गोविंद राधे।

22प्रेम दान में काहे किन्तु लगा दे॥ 65॥

23तू तो अन्यथा कर्तुं गोविंद राधे।

24समरथ बिनु पात्र प्रेम दिला दे॥ 66॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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