Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
दैन्य माधुरी · पृष्ठ 5
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1तू तो मन ही में रह गोविंद राधे।
2पुनि मन शुद्ध नहिं हुआ क्यों बता दे॥ 43॥
3या तो मन शुद्ध करु गोविंद राधे।
4या तो तू चला जा राधारानी को बुला दे॥ 44॥
5तू तो मेरा है ही हरि गोविंद राधे।
6मैं भी तेरा हूँ या नहिं तू भी बता दे॥ 45॥
7तू तो कह तू है मेरा गोविंद राधे।
8यदि मैं हूँ तेरा निज प्रेम दिला दे॥ 46॥
9तू जो दिव्य प्रेम ना दे गोविंद राधे।
10तो निज जन ते ही प्रेम दिला दे॥ 47॥
11जिसको भी चाह ले तू गोविंद राधे।
12सोइ हो सुहागिनि वेद बता दे॥ 48॥
13दीनों में दीन हूँ मैं गोविंद राधे।
14तू है दीनबन्धु मोहिं बन्धु बना दे॥ 49॥
15तू तो है दीनबन्धु गोविंद राधे।
16तृण ते अधिक मोहिं दीन बना दे॥ 50॥
17दीनता हो ऐसी जामें गोविंद राधे।
18दीनताभिमान लेश भी न हो बता दे॥ 51॥
19तृण ते अधिक नम्र गोविंद राधे।
20तरु ते भी अधिक सहिष्णु बना दे॥ 52॥
21सब को दूँ सम्मान गोविंद राधे।
22आपु मान चाहूँ नहिं ऐसा बना दे॥ 53॥
23स्तुति सुनि फूलूँ नहिं गोविंद राधे।
24निन्दा सुनि पिचकूँ ना ऐसा बना दे॥ 54॥