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Radha Govind Geet Part 1

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

दैन्य माधुरी · पृष्ठ 4

Reading 17 of 516 · Source nos. 31–42 · Source PDF 21

1निज सेवा ना दे यदि गोविंद राधे।

2निज दास दास दास सेवा दिला दे॥ 31॥

3तेरा ही रूप गुरु गोविंद राधे।

4उनकी ही सेवा करुँ ऐसा बना दे॥ 32॥

5मैं हूँ तेरा नित्य दास गोविंद राधे।

6मेरा वही दासत्व मो को दिला दे॥ 33॥

7दासी न बनावे यदि गोविंद राधे।

8निज दासी गोपियों की दासी बना दे॥ 34॥

9सब कछु है तेरा गोविंद राधे।

10सब कछु ले ले मोहिं प्रेम सुधा दे॥ 35॥

11तू ही मेरा सब कछु गोविंद राधे।

12पुनि क्यों भुलाया मोहिं निठुर बता दे॥ 36॥

13वेद कह “माहं ब्रह्म” गोविंद राधे।

14भाव मैं तोहिं तू मोहिं ना भुला दे॥ 37॥

15मैं तो भूला माया वश गोविंद राधे।

16तू तो मायाधीश क्यों भुलाया बता दे॥ 38॥

17माना मैं पतित अति गोविंद राधे।

18दोषी तेरी दासी माया मैं ना बता दे॥ 39॥

19पापों की जननी तो गोविंद राधे।

20माया है दासी तेरी मोहिं दोष का दे॥ 40॥

21माया का भी दोष नाहिं गोविंद राधे।

22माया जड़ तू चाहे जैसा घुमा दे॥ 41॥

23तेरा भी दोष नाहिं गोविंद राधे।

24आया न शरण तेरी तोहिं दोष का दे॥ 42॥

Original Hindi couplets from the supplied Part 1 edition, grouped by printed page and chapter. Native verse numbers remain 1–5901; page order is not verse numbering. Supplied edition: Fourth edition, January 2010. Publisher: Radha Govind Samiti, New Delhi.

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