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आकर उनके सरल, सरस, अनुभूत एवं विलक्षण उपदेशों को सुनें तथा अपने
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1आकर उनके सरल, सरस, अनुभूत एवं विलक्षण उपदेशों को सुनें तथा अपने
2जीवन में उसे क्रियात्मक रूप से उतारकर अपना कल्याण करें।””
3इसके पश्चात् आपको काशी विद्वत्परिषत् (भारत के लगभग 500 शीर्षस्थ
4शास्त्रज्ञ, वेदज्ञ विद्वानों की सभा है) ने काशी आने का निमंत्रण दिया।
5श्री कृपालु जी के कठिन संस्कृत में दिये गये विलक्षण प्रवचन को सुनकर एवं
6भक्तिरस से ओत-प्रोत अलौकिक व्यक्तित्व को देखकर सभी विद्वान् मंत्रमुग्ध हो गये।
7तब सबने एकमत होकर आपको ““जगद्गुरूत्तम”” की उपाधि से विभूषित किया।
8उन्होंने स्वीकार किया कि श्री कृपालु जी जगद्गुरुओं में भी सर्वोत्तम हैं।
9....धन्यो मान्य जगद्गुरूत्तम पदैः सोऽयं समभ्यर्च्यते।
10यह ऐतिहासिक घटना 14 जनवरी सन् 1957 को हुई। उस समय श्री कृपालु जी
11महाराज की आयु मात्र 34 वर्ष की थी। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज विश्व के
12पाँचवे मूल जगद्गुरु हैं। उनके पूर्व केवल चार महापुरुषों को ही जगद्गुरु की मूल
13उपाधि प्रदान की गई थी- जगद्गुरु श्री शंकराचार्य, जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, जगद्गुरु
14श्री रामानुजाचार्य एवं जगद्गुरु श्री माध्वाचार्य।
15जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज समन्वयवादी जगद्गुरु हैं अतएव ये पूर्ववर्ती समस्त
16आचार्यों (जगद्गुरु निम्बाकाचार्य, जगद्गुरु रामानुजाचार्य, जगद्गुरु माध्वाचार्य
17एवं चैतन्यदेव) के दार्शनिक सिद्धान्तों को सही सिद्ध करते हुये अपना समन्वयवादी
18सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैँ अतः “काशी विद्वत्परिषत्” ने इन्हें “निखिलदर्शन समन्वयाचार्य”
19की उपाधि से विभूषित किया, साथ ही भगवत्प्रेम के अष्ट सात्विक भावों को देखकर
20उन्हें “भक्तियोग रसावतार” की उपाधि भी प्रदान की।