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Shri Radha Trayodashi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

गौर तनु, चिदानन्द बलिहार।

Reading 16 of 20 · Radha · Source no. 12 · Source PDF 27–28

1१२.

2गौर तनु, चिदानन्द बलिहार।

3अगणित चन्द्र सिन्धु मन्थन करि, निकसे जो रस सार।

4मथि रस सारहूँ सार तत्व सो, कान्ति गौर सरकार।

5चिन्मय दिव्य गौर तनु दुति जनु, दामिनि दिव्य निहार।

6नागरि तनु दुति लखत गिरत नट, नागर धरनि मझार।

7रति रस नागरि गुण आगरि पर, अगनित रति दऊँ वार।

8कह ‘कृपालु’ तनु रोम रोम ते, बह ब्रजरस की धार।

9भावार्थ: श्री राधा के सच्चिदानन्दमय शरीर पर मैं बलिहार जाता हूँ।

10सागर मन्थन के पश्चात् रस के सार स्वरूप मानो असंख्यों चन्द्र

11प्रकट हुये हों। उस रस के सार रूप चन्द्रों को मथ कर जो सार तत्व

12प्राप्त हो, ऐसी दिव्य कान्ति श्री राधा के अंगों की है। राधा के दिव्य चिन्मय

13गौर अंगों की कान्ति दिव्य विद्युत के समान है। नागरी राधा के तन की

14आभा को देख कर नागर कृष्ण पृथ्वी पर बेसुध होकर गिर पड़ते हैं।

15श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं कि श्री राधा के रोम-रोम से ब्रजरस का अखण्ड

16प्रवाह निःसृत होता रहता है।

Thirteen source-numbered Radha verses with published Hindi meanings from the supplied Hindi source. Numbering and contributor credits remain edition-specific. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : गुरुपूर्णिमा, ११ जुलाई, २००६.

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