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Shri Radha Trayodashi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

किशोरी जू को इकटक लख रिझवार।

Reading 15 of 20 · Radha · Source no. 11 · Source PDF 25–26

1११.

2किशोरी जू को इकटक लख रिझवार।

3सिर पर मुकुट चन्द्रिका तापर, बंदनि गौर लिलार।

4बिन्दी भाल लाल लाली के, शोभा सिन्धु अपार।

5जनु बन्धूक पुष्प सों पूज्यो, सखि मुख चन्द्र निहार।

6वेणी लट तट भृकुटि लटक भल, लखत बनत बलिहार।

7मन मोहन मन मीन फंसावनि, हित जनु वंशी धार।

8दृग उज्वल आकर्ण चपल अति, मोहित नन्दकुमार।

9दृग विशाल जनु कह ‘कृपालु’ कछु, कानन कान मझार।

10भावार्थ: रसिक प्रियतम कृष्ण प्रिया राधा के रूप का दर्शन निर्निमेष नेत्रों

11से करते हैं। सिर पर मुकुट पर चन्द्रिका है। गौर वर्ण के ललाट पर बन्दनी

12शोभा पा रही है। लाड़िली के भाल पर अरुण वर्ण का सिन्दूर बिन्दु शोभा

13का अपार समुद्र ही है। ऐसा प्रतीत होता है कि सखियों ने इस श्री मुख

14को चन्द्र समझ कर बंधूक के लाल वर्ण के पुष्प द्वारा इसकी पूजा की है।

15वेणी की एक लट भृकुटि के ऊपर लटक रही है। यह काली लट उस

16वंशी के समान है जो प्रियतम के मन रूपी मछली को फँसाने के हेतु श्री

17राधा ने धारण की है। उज्ज्वल कर्ण पर्यन्त नेत्र अति चंचल हैं जिनसे

18नन्दनन्दन मुग्ध रहते हैं। श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं कि विशाल नेत्रों को

19देखकर भ्रम होता है कि ये कानों के कान में कुछ कहना चाहते हैं।

Thirteen source-numbered Radha verses with published Hindi meanings from the supplied Hindi source. Numbering and contributor credits remain edition-specific. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : गुरुपूर्णिमा, ११ जुलाई, २००६.

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