Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्यामा जू के श्री मुख पर बलिहार।
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1१०.
2श्यामा जू के श्री मुख पर बलिहार।
3चिन्मय दिव्य कोमल मुख लखि हौं, मूरछित नन्दकुमार।
4विकसित आनन्द मोद पुष्प जनु, श्री मुख भानुदुलार।
5मुख अरु कुण्डल कान्ति मिलित छवि, चन्द्र सूर्य अनुहार।
6वेणी अनियारी घुँघरारी, गुम्फित कुसुम निहार।
7जनु ‘कृपालु’ घन श्याम चन्द्र मुख, छवि पर करत विहार।
8भावार्थ: श्यामसुन्दर कहते हैं कि मैं किशोरी राधा के श्री मुख पर
9बलिहार जाता हूँ। श्री राधा के दिव्य चिन्मय कमल के समान आनन
10पर कामदेव को मोहित कर लेने वाला मैं साक्षात् श्री कृष्ण भी मूर्च्छा
11को प्राप्त हो जाता हूँ। भानुनन्दिनी का श्री मुख मानो आनन्द एवं
12प्रसन्नता का विकसित कुसुम ही है। मुख और कुण्डल की कान्ति
13मिल कर चन्द्र और सूर्य का रूप धारण कर रही है। मुख की आभा
14चन्द्र के समान एवं कुण्डलों की कान्ति साक्षात् सूर्य ही है। घने
15घुँघराले केशों की वेणी में पुष्प भी गूथे गये हैं। श्री ‘कृपालु जी’
16कहते हैं- ऐसा प्रतीत होता है कि काले केश नीले बादलों के समान
17राधा के चन्द्रानन पर छाये हुए हैं।