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Shri Radha Trayodashi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

श्यामा जू हैं, सात सिन्धु की सार।

Reading 11 of 20 · Radha · Source no. 7 · Source PDF 17–18

1७.

2श्यामा जू हैं, सात सिन्धु की सार।

3एक सिन्धु वैदग्ध्य सिन्धु है, कला विलास प्रकार।

4एक सिन्धु अनुराग सिन्धु है, मादन भाव निहार।

5एक सिन्धु वात्सल्य सिन्धु है, दीनन हित सरकार।

6एक सिन्धु है कृपा सिन्धु जो, सुनत प्रपन्न पुकार।

7एक सिन्धु लावण्य सिन्धु है, पिये सतत रिझवार।

8एक सिन्धु है केलि सिन्धु जो, रिझवत नन्दकुमार।

9एक सिन्धु है रूप सिन्धु जो, रसिकन प्राणाधार।

10सप्त सिन्धु की ज्यों ‘कृपालु’ भू, त्यों वृषभानु दुलार।

11भावार्थ: श्री राधा का दिव्य वपु मानो सप्त सिन्धु का सार ही है। अनेक

12प्रकार की विलास कलाओं का वैदग्ध्य सिन्धु प्रथम है। दूसरा मादनाख्य

13महाभाव का अनुराग सिन्धु है, जिससे प्रेमी नन्दनन्दन सदैव ही प्रिया राधा

14के वशीभूत रहते हैं। दीन जनों के हित श्री राधा उर में विलोडित सिन्धु

15तीसरा सिन्धु है। शरणागत जीवों का क्रन्दन श्रवण करने हेतु श्री राधा के

16हृदय में कृपा सिन्धु भी सदैव हिलोरें लेता रहता है। पाँचवाँ लावण्य

17सिन्धु है, जो रसिक शेखर श्री कृष्ण की रूप-रस-पान की तृष्णा को सदा

18अक्षुण्ण रखता है अर्थात् रूप रस पान करते हुए भी वे अतृप्त बने रहते

19हैं। श्री राधा में स्थित केलि सिन्धु उनके प्रियतम को सदा रस विवश

20किये रहता है। श्री राधा का रूप सिन्धु तो रसिकों के प्राणों का आधार ही

21है। श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं कि इस प्रकार से भानुनन्दिनी सातों समुद्रों से

22युक्त पृथ्वी के समान ही हैं।

Thirteen source-numbered Radha verses with published Hindi meanings from the supplied Hindi source. Numbering and contributor credits remain edition-specific. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : गुरुपूर्णिमा, ११ जुलाई, २००६.

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