Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
किशोरी जू की, छवि लखि गई बलिहार।
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1६.
2किशोरी जू की, छवि लखि गई बलिहार।
3छवि सौन्दर्य सार रस पिय नित, नागर नन्द कुमार।
4इकटक लखन चहत दृग फिसलत, तनु ते बारम्बार।
5रूप अगाधा राधा की छवि, प्रेम सुधा रस सार।
6अगनित विद्युल्लता निछावर, छवि प्रतिबिम्ब निहार।
7छवि प्रतिबिम्ब ‘कृपालु’ देखि हौं, चन्द्र अमित दऊँ वार।
8भावार्थ: मैं भानु किशोरी श्री राधा की छवि पर बलिहार जाती हूँ। श्री
9राधा के सौन्दर्य के सार का रस पान तो निरन्तर उनके चतुर प्रियतम
10नन्दनन्दन ही कर पाते हैं। श्री कृष्ण के नेत्र जब प्रिया राधा की रूपमाधुरी
11को निर्निमेष होकर निहारना चाहते हैं, तब वे बड़भागी नेत्र श्री राधा की
12स्नेहयुक्त देह से फिसल पड़ते हैं। अगाध रूप से परिपूर्ण श्री राधा की
13छवि के प्रतिबिम्ब मात्र पर असंख्यों दामिनियों को न्यौछावर किया जा
14सकता है। श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं कि श्री राधा की छवि के प्रतिबिम्ब मात्र
15पर मैं असंख्यों चन्द्रों को वार दूँ।