Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
किशोरी जू की, अद्भुत छवि बलिहार।
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1३.
2किशोरी जू की, अद्भुत छवि बलिहार।
3चम्पक वरनि गौर तनु अद्भुत, रूप माधुरी सार।
4अंग अंग सुन्दरता अद्भुत, अगनित रति दऊँ वार।
5उनकी चितवनि मुसुकनि अद्भुत, गवनि हंस रिझवार।
6उनकी गति मति रति अति अद्भुत, मोहति नंदकुमार।
7सब ‘कृपालु’ अद्भुत अति अद्भुत, अद्भुत मानी हार।
8भावार्थ: एक सखी दूसरी सखी से कहती हैं- श्री राधिका का आश्चर्य
9युक्त रूप देखते ही बनता है। श्री राधा के शरीर का वर्ण चम्पा पुष्प के
10समान है। श्री राधा का यह गौर वपु अद्भुत रूप माधुर्य का सार स्वरूप
11ही है। श्री राधा के प्रत्येक अंग के सौन्दर्य पर असंख्यों रति को न्यौछावर
12किया जा सकता है। उनकी चितवन एवं मुस्कान अत्यन्त ही अनूठी है।
13श्री राधा की मदमाती चाल को देखकर हंस भी लज्जित हो जाते हैं।
14वृषभानुनन्दिनी की गति, मति एवं रति अनोखी ही है जिससे वे अपने
15प्रियतम को मुग्ध कर लेती हैं। श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं- श्री राधा का
16सभी कुछ विलक्षण है। स्वयं अद्भुत भी उनके समक्ष पराजित हो गया।