Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
छबीली छवि, लखि छवि मानी हार।
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1२.
2छबीली छवि, लखि छवि मानी हार।
3छवि साकार खरी कर जोरे, सेवत भानु दुलार।
4चँवर ढुरावे सुकुमारी ढिंग, सकल कला साकार।
5प्यारी सेवा में रह तत्पर, दिव्य प्रभा तनु धार।
6अगनित रति आरती उतारें, करि करि जय जयकार।
7इक टक लखत ‘कृपालु’ लाल जू, निज सुधि देह बिसार।
8भावार्थ: छवि की खान श्री राधा का दर्शन कर साक्षात् छवि भी पराजित
9हो गई। मूर्तिमती छवि हाथ जोड़े भानुनन्दिनी की सेवा में खड़ी रहती हैं।
10समस्त कलायें साकार रूप धारण कर सुकुमारी राधिका के ऊपर चँवर
11ढुलाती रहती हैं। दिव्य प्रभा साकार रूप धारण कर प्रिया राधा की सेवा
12में तल्लीन रहती है। असंख्यों रति जय जय का शब्द उच्चारण करती हुई
13राधा मुख-कमल की आरती उतारती हैं। श्री ‘कृपालु जी’ के शब्दों में
14श्री श्यामसुन्दर अपनी देह सुधि को भूलकर निर्निमेष नयनों से
15राधा-सौन्दर्य-सुधा का पान करते हैं।