लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
Shri Radha Trayodashi

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

हमारी गौर वरनि सरकार।

Reading 5 of 20 · Radha · Source no. 1 · Source PDF 5–6

1१.

2हमारी गौर वरनि सरकार।

3पिय चित चोरी भानु किशोरी, अति भोरी रिझवार।

4तनु दुति तप्त स्वर्ण दुति ते हूँ, अति उद्दीप्त निहार।

5श्री श्रीअंग दिव्य सौरभ ते, सुरभित नन्दकुमार।

6श्री श्रीअंग मृदुलता लखि दऊँ, कोटि मृदुलता वार।

7कह ‘कृपालु’ श्री अंग अंग लखि, पिय सुधि देह बिसार॥

8भावार्थ: स्वामिनी श्री राधा जू गौर वर्ण वाली हैं। प्रियतम श्यामसुन्दर

9के चित्त को चुराने वाली वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली भाली हैं।

10उनके शरीर की कान्ति तपाये हुए स्वर्ण से भी अधिक दीप्तिमती है।

11उनके श्रीअंग अंगों की दिव्य गन्ध से नन्दनन्दन भी सुगन्धित हो गये।

12श्री राधा के अंगों की कोमलता को देखकर करोड़ों कोमलताओं को भी

13न्यौछावर किया जा सकता है। श्री ‘कृपालु जी’ कहते हैं कि श्री राधा के

14प्रत्येक अंग को देखकर श्री कृष्ण भी आत्म विस्मृत हो जाते हैं।

Thirteen source-numbered Radha verses with published Hindi meanings from the supplied Hindi source. Numbering and contributor credits remain edition-specific. Supplied edition: द्वितीय संस्करण : गुरुपूर्णिमा, ११ जुलाई, २००६.

Source edition and PDF · Text version