Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
नीलमणि नैनन पर बलिहार।
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2नीलमणि नैनन पर बलिहार।
3इन नैनन रस जानति-नीके, श्री वृषभानु दुलार।
4तीन रंग श्वेतिमा अरुणिमा, अरु कालिमा निहार।
5डूब न जाय रसिक नैनन रस, याते पलक विहार।
6पलकनि ऊपर अटपट नटखट, भृकुटि काम धनु धार।
7जब तिरछे नैनन बानन सों, मारत नंदकुमार।
8तब ‘कृपालु’ शिव बने शिवानी, कह ‘हा प्राणाधार’!
9भावार्थ:-रसिक संत निज इष्ट के रसीले नेत्रों पर बलिहार जाते
10हुए कहते हैं-इन नेत्रों के अद्भुत रस का अनुभव एकमात्र
11वृषभानुनन्दिनी ही करती हैं। कृष्ण के नेत्र तीन प्रकार के रंगों से
12युक्त हैं। नेत्रों का मध्य भाग श्वेत है। नेत्रों के कोर (प्रान्त भाग)
13अरुण हैं एवं श्याम-पुत्तलिका कृष्ण वर्ण की है। इन नेत्रों का दर्शन
14कर रसिकों का मन कहीं अगाध रस-सिंधु में डूब न जाय, इस
15कारण नेत्रों के ऊपर पलक रचना हुई है। ये पलकें बार बार उठती
16हैं, गिरती हैं। कभी नेत्रों का दर्शन करा देती हैं, कभी दृष्टा की
17दृष्टि से बचाने के लिये नेत्रों के रस को ढांप लेती हैं। पलकों के
18ऊपर टेढ़ी भृकुटियाँ कामदेव के धनुष का रूप धारण किये हैं।
19जब श्यामसुंदर अपनी चंचल भृकुटि रूपी धनुष पर तिरछी चितवन
20का बाण रखकर लक्ष्य पर चलाते हैं, उस समय उनके कटाक्षपात
21से घायल हुए शिव भी शिवानी बने हा प्राणधन ! कह मूर्छित हो
22जाते हैं।