Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
श्याम के कंधे सुघर निहार।
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2श्याम के कंधे सुघर निहार।
3सुंदर कंध सुडौल सिंहहूँ, कंध लजावन हार।
4कंधों के नीचे जनु जलधर, नीलकण्ठ छविदार।
5उसमें चमचम कौस्तुभ मणि की, चमक चमक बलिहार।
6पुनि गर रंग बिरंगे रत्नन, मणि मुक्तन को हार।
7कोउ कंठ कोउ वक्ष कोउ कटि, लौं कर हार विहार।
8पुनि हारन संग गुंज माल दुति, इन्द्र धनुष रँग धार।
9लखि ‘कृपालु’ वनमाल सुगंधनि, शंभु समाधि बिसार।
10भावार्थ:-श्यामसुंदर के सुडौल स्कंध विचित्र शोभा धारण किये
11हैं। ये ऊंचे कंधे सिंह के कंधों को भी लज्जित कर रहे हैं। युगल
12स्कन्धों के निम्न भाग में नीले बादल के समान नीला कण्ठ सुशोभित
13हो रहा है। नीले कंठ में चमचमाते हुए कौस्तुभमणि की चमक को
14देखकर स्वयं चमक भी बलिहार जाती है। कंठ में रंगबिरंगे रत्नों,
15मणियों एवं मुक्ताओं के हार हैं। कोई हार केवल कण्ठ तक ही है,
16कोई वक्षस्थल पर विहार करता है, तो कोई कटि-पर्यन्त शोभित है।
17कण्ठ के विविध प्रकार के हारों के साथ साथ गुंजमाला की द्युति
18इन्द्रधनुष का रंग धारण कर रही है। कण्ठ में पांच प्रकार के पुष्पों
19(पारिजात, कुंद, मन्दार, तुलसी आदि) की वनमाला की सुगन्ध ने
20तो भगवान शिव की समाधि तोड़ दी।