Dainik Prarthana — source anthology; see printed contributor credits
जगद्गुरु की आरती
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1जगद्गुरु की आरती
2जयति जगद्गुरु गुरुवर की,
3गावो मिलि आरती रसिकवर की।
4गुरु पद-नख-मणि-चन्द्रिका प्रकाश,
5जाके उर बसे ताके मोह तम नाश।
6जाके माथ नाथ तव हाथ कर वास,
7ताते होय माया मोह सब ही निरास।
8पावे गति मति रति राधावर की,
9गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 1॥
10अरे मन मूढ़! छाँड़ु नारी नर हाथ,
11गुरु बिनु ब्रह्म श्यामहूँ न देंगे साथ।
12कोमल कृपालु बड़े कृपासिंधु नाथ,
13पाके इन्हें आज तू अनाथ हो सनाथ।
14इन्हीं के आधीन कृपा गिरिधर की
15गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 2॥
16भक्तियोग-रस-अवतार अभिराम,
17करें निगमागम समन्वय ललाम।
18श्यामा-श्याम नाम, रूप, लीला, गुण, धाम,
19बाँटि रहे प्रेम निष्काम बिनु दाम।
20हो रही सफल काया नारी नर की,
21गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 3॥
22लली लाल लीला का सलोना सुविलास,
23छाया दिव्य दृष्टि बिच प्रेम का प्रकाश।
24वैसा ही विनोद वही मंजु मृदु हास,
25करें बस बरबस उच्च अट्टहास।
26झूमि चलें चाल वही नटवर की,
27गावो मिलि आरती रसिकवर की॥ 4॥
28अर्थ - निवेदन है कि सभी साधक वृन्द सामूहिक रूप से प्रेम
29पूर्वक रसिकों में सर्वश्रेष्ठ जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की
30आरती गाओ। श्री मद् सद्गुरु सरकार की सदा जय जयकार हो।
31आपके चरण-कमलों की नख मणियाँ अनन्तानन्त दिव्य ज्योति
32से प्रदीप्त हैं। अतः जो जीवात्मा इन्हें अपने हृदय में धारण कर
33लेता है उसका मोह रूपी अन्धकार सदा को समाप्त हो जाता है।
34जिसके सिर पर आप अपना वरद हस्त रख देते हैं उसकी माया
35निवृत्ति हो जाती है, और वह सद्गुरु कृपा प्राप्त जीव श्रीकृष्ण
36की गति, बुद्धि एवं दिव्य प्रेमानन्द को प्राप्त कर सदा सदा को
37धन्य हो जाता है।
38अतः सभी साधक जन एक स्वर से प्रेमोन्मत्त होकर ऐसे रसिक
39शेखर गुरु देव की आरती गाओ।
40हे मूर्ख मन! तू सांसारिक सम्बन्धियों के आश्रय को छोड़ दे। तू
41अनादिकाल से अनाथ की भाँति चौरासी लाख योनियों में भटक
42रहा है आज ही इन गुरु देव को अपना सर्वस्व मानकर इनकी
43शरणागति ग्रहण कर सनाथ बन जा।
44इन गुरु देव के बिना श्रीकृष्ण भी तेरा साथ नहीं देंगे।
45ये गुरु देव अतिशयातिशय कोमल, उदार एवं कृपा के अगाध
46समुद्र हैं और सबसे महत्त्वपूर्व बात तो यह है कि श्रीकृष्ण की
47कृपा भी इन्हीं के अधीन है-
48गोपी प्रेम के मूर्तिमान रसावतार हैं। साथ ही सभी शास्त्रों वेदों
49का समन्वय बड़े ही मार्मिक एवं हृदयग्राही ढंग से करने में
50पारंगत हैं।
51आप श्यामा-श्याम के नाम, रूप, लीला, गुण धाम की मधुरिमा
52से सब को सराबोर कर देते हैं। अतः आप लोक कल्याणार्थ
53निष्काम गोपी प्रेम अर्थात् मोक्षपर्यन्त की कामना से रहित एवं
54श्रीकृष्ण सुखैकतात्पर्यमयी भक्ति की अमूल्य निधि को बिना
55किसी मूल्य के वितरित कर रहे हैं। जिसे प्राप्त कर असंख्य
56व्यक्ति अपने मानव देह को कृतार्थ कर रहे हैं।
57अतः हे भक्त जनों ! ऐसे रसिक शिरोमणि की आरती का गान
58करो।
59आप लीला विग्रह श्री राधा-माधव के साकार स्वरूप होने के
60कारण उन्हीं युगल सरकार की लीला माधुरी से संयुक्त हैं एवं
61वही दिव्य प्रेमानन्द आपकी दृष्टि में छलकता है।
62अपरिमेय दिव्य प्रेम सिन्धु में अवगाहन करने के कारण आपका
63हास विलास भी विमल, रससिक्त एवं उच्च मधुर अट्टहास के
64रूप में प्रकट होता है।
65उन्हीं नटवर नागर की प्रेमोन्मत्त, मदमत्त चाल से आप चलते हैं।
66हे प्रिय भक्तों! ऐसे रसिक शेखर गुरु देव की आरती को भावमय
67होकर गाओ।